अर्जुनमाली की ऐतिहासिक कहानी (Arjun Mali Super Hit Story)

अर्जुनमाली की ऐतिहासिक कहानी-(Arjun Mali Super Hit Story)

राजगृही नगरी के मालाकारों में अर्जुन का प्रमुख स्थान था । नगरी के बाहर उसकी विशाल पुष्पवाटिका थी । जहाँ से प्रतिदिन पुष्प चयन कर, माला बनाकर वह बेच आता था । यही उसकी एकमात्र आजीविका थी ।

एक दिन किसी महोत्सव के प्रसंग में वह अपनी पत्नी के संग पुष्प चयन करने को निकला और अच्छे-अच्छे फूलों को चुनकर सर्वप्रथम ‘मुद़्गरपाणि’ यक्ष को भेंट चढ़ाने की भावना से यक्षालय पहुँचा और यक्षदेव को प्रणाम करने लगा । इधर नगर के कुछ स्वेच्छाचारी पुरुष जो जो निरंकुश भाव से यक्षालय है के अगल-बगल घूम रहे थे, अर्जुन की स्त्री ‘बन्धुमती’ को देखकर कामोन्मत्त हो गए । उन्होंने अर्जुन माली को बाँधकर बन्धुमती से दुराचार सेवन करना चाहा । इसके लिए वे मंदिर के भीतर छिपकर अवसर की प्रतीक्षा करने लगे ।

भाव विभोर होकर अर्जुन ने ज्योंही यक्ष के आगे सिर झुकाया कि उन कामी पुरुषों ने सहसा उस पर हमला बोल दिया और उसे खूब मजबूती से बांधकर, उसके सामने उसकी स्त्री बन्धुमती के साथ दुराचार किया । सचमुच यह घटना अर्जुन के लिए बहुत बड़ा आघात थी । उन निरंकुश कामियों के सामने ही बंधन-बद्ध अर्जुन ने रोष में भर कर अपने प्रणम्य यक्ष को भी बहुत कुछ भला बुरा कह सुनाया ।

अर्जुन की भावना से प्रभावित होकर यक्ष ने उसके शरीर को प्रभावित किया, फलतः उसके बंधन स्वतः टूट गये । बंधन टूटते ही उसने उन कामियों पर भीषण प्रहार किया जिससे वे सभी काल के गाल में चले गये । बाद में भ्रष्टा जानकर उसने बन्धुमती को भी मार डाला । उसके मन में अब फूल की कोमलता की जगह कुलिश की कठोरता आ गयी थी । नित्यप्रति फूल तोड़ने वाले उस अर्जुन ने अब मानव-मूण्ड तोड़ना प्रारंभ कर दिया था । क्रोध का वेग और प्रतिक्रिया की भावना उसमें इतनी भर गयी थी कि, जिससे प्रभावित होकर वह नित्य छः पुरुष और एक स्त्री का वध करने लग गया । अर्जुन के डर से उधर का मार्ग बंद हो गया । नगरी के लोग बहुत चिन्तित हुए और इसके निवारण के लिए अनेक उपाय सोचने लगे, किंतु उनमें से एक भी उपाय कारगर नहीं हुआ ।

संयोगवश एक दिन भगवान महावीर, नगरी के बाहर उद्यान में पधारे । भक्त लोग दर्शन के लिए उत्कण्ठित होकर भी भय के मारे नगरी के बाहर नहीं निकल पाये । श्रेष्ठिपुत्र सुदर्शन को जब इसका पता चला तो उसका मन नहीं माना । माता-पिता की आज्ञा लेकर उसने भगवान के चरणवन्दन में जाने का निश्चय किया ।

पुत्र की दृढ़ इच्छा देखकर माता-पिता ने सहमते हुए दिल से, दर्शन के लिए जाने की अनुमति दे दी । सुदर्शन मन में प्रभु ध्यान धारण किए हुए घर से निकल पड़ा और नगरी के बाहर यक्षायतन के पास पहुँच गया । यक्षायतन के पास पहुँचते ही अर्जुन दौड़ा और सुदर्शन पर प्रहार करना चाहा । यक्ष-बाधा को सन्मुख उपस्थित देखकर सुदर्शन ने मन ही मन भगवान के चरणों में वन्दन किया और सावद्य त्याग पूर्वक सागारी अनशन स्वीकार कर लिया । फिर क्या था ? यक्ष अपनी शक़्ति का पूर्ण प्रयोग करके थक गया, पर सुदर्शन के तपस्तेज के सामने उसका कुछ भी वश नहीं चला । हारकर वह अर्जुन के शरीर से बाहर हो गया ।

यक्ष उपद्रव के टल जाने तथा अर्जुन के प्रकृतिस्थ हो जाने पर सुदर्शन भगवान के दर्शन को जाने लगा । सुदर्शन को वहाँ से जाते देखकर यक्ष प्रभाव मुक़्त अर्जुन ने उससे पूछा- “श्रीमान! आप कौन हैं और कहां जा रहे हैं ?” सुदर्शन ने अपना परिचय दिया और कहा- “यहाँ पास में ही पधारे हुए भगवान महावीर को वन्दन करने जा रहा हूँ ।”अर्जुन ने जिज्ञासा से कहा- “क्या मुझे भी प्रभु वन्दन को साथ ले चलेंगे ?” सुदर्शन ने कहा- “क्यों नहीं, चलिये और अवश्य चलिये ।”

इस प्रकार अर्जुनमाली भी सुदर्शन के साथ प्रभु की सेवा में पहुँचा और उनकी वीतरागमयी वाणी का रसास्वादन किया । प्रभु की देशना सुनकर अर्जुन के मन में किए हुए पाप के प्रति पश्चाताप होने लगा । वह अपने द्वारा की हुई हत्याओं के प्रति सोचने लगा । उसने आत्मशुद्धि का एकमात्र उपाय प्रभु के चरणों में अपने आप को समर्पण कर देना समझा । वह खड़ा हुआ और प्रभु से प्रार्थना करने लगा कि- “भगवन्! मुझे अपने चरणों में मुनिधर्म की दीक्षा प्रदान करें ।” तथास्तु, कहकर प्रभु ने अर्जुन को दीक्षित बनाकर श्रमण संघ में शरण प्रदान की ।

अर्जुन अब मुनि बन गया । उसने अपने पापों को निर्मूल करने के लिए आजीवन अभिग्रह धारण किया कि आज से मुझे निरन्तर बेले-बेले की तपस्या करना है और जो भी उपसर्ग उत्पन्न हों, उन्हें समभाव से सहन करना है ।

मुनि अर्जुन छः महीने तक उपर्युक्त विधि से उग्र तपस्या करता रहा । भिक्षा के समय परिचित लोग अपने वैर का स्मरण कर गाली देते, प्रहार करते और निन्दनीय वचनों से उसे धिक्कारते, मगर वह समभाव पूर्वक सब कुछ सहन कर लेता । इस प्रकार अल्पकाल में ही उसने घातिकर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया और मुक़्ति पायी ।

उपशमभाव पूर्वक की गई तपस्या का कितना बड़ा फल है, अर्जुन मुनि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं । बड़े से बड़ा पापी भी तप की आग में तपकर कुन्दन की तरह अवदात बन जाता है । धन्य है ऐसे दुष्कर तप को और उसके आराधक अर्जुन मुनि को ।

~ ‘कुलक कथाएँ’ पुस्तक से साभार

जिनवाणी मासिक पत्रिका, जनवरी 2007 से साभार

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