द्वेष किससे हैं ? Who are the haters?

द्वेष किससे हैं ? Who are the haters?

दो मित्र गाडी में जा रहे थे, सहसा एक जगह लोगों की भीड दिखी, दोनो विचार में पड गये कि क्या हो गया ।

ड्रायवर से पूछा कि क्या हुआ, ड्रायवर ने कहा “साहब कुछ नही, ये तो चलता रहता हैं, एक पार्टि वाले दूसरी पार्टी के नेता ज्ञानप्रकाश का पुतला जला रहे हैं ।

बस फिर क्या था दोनो मित्रों में एक दिलचस्प चर्चा चली ।

चेतन: भ्रमण मैं यही सोच रहा हूँ कि लोग भी कितने अजीब होते हैं

भ्रमण: क्यों क्या हुआ ?

चेतन: अरे अभी तो देखा लोग घास लकडी से भी द्वेष रखते हैं, इतना द्वेष की जला ही डाला ।

भ्रमण: मेरी उडा रहा हैं क्या? कौन भला घास से द्वेष रखेगा? उनका द्वेष तो नेता से था ।

चेतन: ये कैसे संभव हैं ? नेता से द्वेष था तो नेता को जलाते । नही नही, उनको द्वेष घास लकडी से ही था ।

भ्रमण: अरे भाई उनको द्वेष नेता से ही हैं इसीलिए तो नेता के पुतले को ही जला रहे थे किसी और घास या लकडी को नही ।
ये पुतला नेता का प्रतीक हैं । इसी लिए नेता का गुस्सा उसके पुतले पर निकाल रहे थे ।

चेतन: मतलब उनका द्वेष नेता से ही हैं घास लकडी कागज से नही ।

भ्रमण: हाँ भई हाँ, ये तो छोटा बच्चा भी समझता हैं ।

चेतन: यही तो मुसीबत हैं भ्रमण जो छोटा बच्चा समझता हैं वह तूँ क्यों नही समझता?

भ्रमण: अरे, मैंने तुझे समझाया और तू मुझे ही बोलता हैं कि मैं नही समझा ।

चेतन: भाई मेरे, नेता का पुतला जलाने के पीछे नेता के प्रति रहा हूआ द्वेष कारण था वैसे ही जिन प्रतिमा की पूजा के पीछे जिनेश्वर के प्रति रहा हुआ आदर भाव कारण हैं ।
मूर्ति पूजा से व्यक्ति पूजा नही मानता पर मूर्ति(पुतला)द्वेष से व्यक्ति द्वेष मानता हैं ये कैसी बात हुई ?

नेता के प्रति रहा हुआ द्वेष पुतले के माध्यम से जैसे व्यक्त किया जाता हैं वैसे ही प्रभु के प्रति रहा हुआ गुणानुराग,अहोभाव,बहुमान प्रभु प्रतिमा के माध्यम से व्यक्त किया जाता हैं ।
यह तो स्वयं प्रभु महावीर भी मानते हैं ।

भ्रमण: भगवान महावीर मानते हैं, कैसे?

चेतन: प्रभु वीर को जब राजा श्रेणिक ने नरक निवारण के उपाय माँगे तब प्रभु ने एक उपाय यह भी बताया था कि कालसौरिक कसाई, जो रोज 500 पाडे मारता था, उसे सिर्फ एक दिन के लिए रोकना । तब राजा श्रेणिक ने उसे कुए में कैद कर रखा था, तो वहाँ उसने मिट्टी/मैल से पाडे की 500 मूर्ति बनाकर मारे थे ।

फिर जब श्रेणिक महाराजा ने पूछा कि क्या उनका नरक टला तो प्रभु वीर ने कहा ‘नही’ ।

अब तुम ही विचार करो,क्या इससे यह पता नही चलता कि प्रभु वीर ने पाडे को और मूर्ति को एक बराबर माना, तभी तो प्रभु ने दोनो की हिंसा का फल एक बराबर जानकर, राजा श्रेणिक का नरक नही टला यह कहा ।

भ्रमण: यह कहानी तो बहुत बार सुनी पर कभी इस तरह विचार नही किया ।

चेतन: बस तो आगे से जो भी कहानी सुनो तो उसमें कौन कौनसे निक्षेप की बात हैं यह समझने की कोशिष करना !

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