श्री सम्मेतशिखर तीर्थ का इतिहास और परिचय Shri Sammetshikhar Tirth

Shri Sammetshikhar Tirth श्री सम्मेतशिखर तीर्थ का इतिहास और परिचय

मधुबन के पास समुन्द्र की सतह से ४४७९ फुट ऊँचे सम्मेतशिखर पाहड पर, जिसे पार्श्वनाथ हिल भी कहते है |
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प्राचीनता –
वर्तमान में यह शेत्र सम्मतशिखर के नाम से जाना जाता है | वर्त्तमान चाबिसी के बीस तीर्थंकर इस पावन भूमि में तपसिया करते हुए अनेक मुनियो के साथ मोक्ष सिधारे है | यह पाहड जगतसेठ को भेट स्वरुप मिला हुआ होने पर भी जगतसेठ द्वारा दुर्ल्ष हो जाने से पाल्गंज राजाको दे दिया गाया था |ई. सं. १९०५-१९१० के दरमीयान पाल्गंज राजा को धन की आवष्यकता पड़ी| राजा ने पाहड बिक्री करने या रहन रखने का सोचा उसपर कलकता के रायबहादुर सेठ श्री बद्रिदास्जी जोहरी मुकीम एवं मुर्शिदाबाद निवासी महाराज बहदुर्सिंघ्जी दुगड़ ने राजा की यह मनोभावना जानकार अहमदाबाद के सेठ आनंदजी कलयाणजि पेढ़ी को यह पाहड खरीदने की प्रेरणा दी व सहयोग देने का आश्वाशन दिया | श्री आनंदजी कलयाणजि पेढ़ी ने खरीदने की तयारी करके प्राचीन फरमान आदि देखे सब अनुकूल पाने पर दिनांक ९-३-१९१८ को रुपये दो लाख़ बीयालिस हज़ार राजा को देकर यह पारसनाथ पाहड ख़रीदा गाया | जिस से पाहड पुण: जैन श्वेताम्बर के अधीन आया | इस काम में इन महानुभावो का सहयोग सरहनीय है | उनकी प्रेरणा व सहयोग से ही यह काम समाप्त हो सका |

 

श्री सम्मेतशिखर तीर्थ का इतिहास और परिचय Shri Sammetshikhar Tirth

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परिचय –
वर्तमान चौबिसी के २० थिर्थानाक्र यहां पर से मोक्ष सिधारे है |और चार थिर्थंकारो में श्री आदिनाथ भगवन अष्टापद से , श्री वासुपूजयभगवन चम्पापुरी से, श्री नेमिनाथ भगवन गिर्नार्जी से, श्री महावीर भगवन पावापुरी से मोक्ष को प्राप्त हुए |इनके अतिरिक्त अनंत मुनिगन यहां पर कटर तपसया करते हुए मोक्ष सिधारे है |
यहां की प्रतिमा का जितना वर्णन करे व कम है |यहां की प्रतिमा तोह हर तीर्थमाला में व स्तवनों आदि में जन-जन में गई जाती है |
अनेक तीर्थंकरो,मुनिगनो की तपोभूमि व निर्वान्भूमि रहने के कारण उन्होंने अपने अन्त-समय में इस पहाड़ पर रहकर धर्मोपदेश्ना देते हुए इस भूमि के कण-कण को अपने चरणकमलो से स्पर्श किया है |अंत: यहां का कण-कण महान पवित्र व पूजनीय है |इस भूमि के स्पर्श मात्र से मानव की आत्मा प्रफुलित होकर प्रभु के स्मरण में लींण हो जाती है |यहां की यात्रा मानव का संकट हरनारी व पापविनाशणकारी है |
श्री भोमीयाजी के मंदिर से कुछ दूर जाते ही पहाड़ की चडाई प्रारम्भ होती है |यात्रा प्रवास-६ मील चदाव ,६ मील परिब्रह्मन , व ६ मील उतराई कूल मिलाकर १८ मील का रास्ता पार करना पड़ता है |इसलिए पाहिले श्री भोमीयाजी बाबा के दर्शन कर श्रीफल चदाकर आगे चले ताकि हमारी यात्रा निर्विघ्न शांतिपूर्वक संपन्न हो |
प्रथम टुंक : लब्धि के दातार भगवान महावीरं के प्रथम गंधार श्री गौतमस्वामी की है |
दूसरी टुंक : सत्रहवे तीर्थंकर श्री कुंथुनाथ भगवान की आती है |
तीसरा टुंक : श्री ऋषभानान शाश्वत जिन की टुंक आती है |
चौती टुंक : श्री चन्द्राननि शाश्वत जिन की टुंक आती है |
पांचवी टुंक : इकिस्वे तीर्थंकर श्री नमिनाथ भगवान की टुंक आती है |
छटी टुंक : अठारहवे तीर्थंकर श्री अहर्नाथ भगवान की आती है |
सातवी टुंक : उनिस्वे तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ भगवान की आती है |
आठवी टुंक: गयारवे तीर्थंकर श्री श्रेयान्सनाथ भगवान की आती है |
नवमी टुंक : नवमे तीर्थंकर श्री सुविधिनाथ भगवान की आती है |
दसवी टुंक : छठे तीर्थंकर श्री पद्मप्रभा भगवान की आती है |
गयारवीं टुंक : बीसवे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान की है |
बारहवी टुंक : आत्वे तीर्थंकर श्री चंद्रप्रभ भगवान की आती है |
तेरहवी टुंक : श्री आदिनाथ भगवान की आती है |
चौदहवी टुंक : चौदहवे तीर्थंकर श्री अनंतनाथ भगवान की है |
पन्ध्र्वी टुंक : दसवे तीर्थंकर श्री शीतलनाथ भगवान की है |
सोलहवी टुंक : तीसरे तीर्थंकर श्री सम्भवनाथ भगवान की है |
सत्रहवी टुंक : बारहवे तीर्थंकर श्री वासुपूजय भगवान की है |
अठार्ह्वी टुंक : चौथे तीर्थंकर श्री अभिनन्दन भगवान की है |
उन्निसवे टुंक : इस टुंक पर स्तिथ यहा के मुखयजलमंदिर का दर्शन होता है |यहां के मुलनायक श्री शामलिया पार्श्वनाथ भगवान है|
बीसवे टुंक : श्री शुभ गंधरस्वामी की आती है |
इकिस्स्वे टुंक : पन्ध्र्वे तीर्थंकर श्री धर्मनाथ की आती है |
बाइसवी टुंक : श्री वारिशेन शाश्वताजिन टुंक की आती है |
तेईसवी टुंक : श्री वर्धमानन शाश्वत जिन टुंक है |
चौबिस्वी टुंक : पांचवे तीर्थंकर श्री सुमतिनाथ भगवान् की आती है |
पच्चीसवी टुंक : सोलहवे तीर्थंकर श्री शांतिनाथ भगवान की आती है |
छबीसवी टुंक : श्री महावीर भगवान् की आती है |
सतताइसवी टुंक : सातवे तीर्थंकर श्री सुपार्श्वनाथ भगवान की है |
अट्टाइसवी टुंक : तह्र्वे तीर्थंकर श्री विमलनाथ भगवान की है |
उन्न्तिस्वी टुंक : द्वितिया तीर्थंकर श्री अजिनाथ भगवान की आती है |
तीसवी टुंक : श्री नेमिनाथ भगवान की आती है |
इकतीसवी टुंक : तेइसवे तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान की है |
मधुबन उतरने पर पुन: भोमीयाजी बाबा का दर्शन कर विश्राम करना है | वापस पहुँचने तक ३-४ बज जाते है | पहुचने पर कुछ थकावट-सी जरूर महसूस होती है | परंतु रात भर में थकावट मिट जाती है |
इस प्रकार महान पवित्र सम्मेतशिखरजी पहाड़ की हमारी यत्रा संपूर्ण होती है |

 

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