हरियाली अमावस्या कब और क्यों मनाया जाता है यह पर्व, जानिए महत्व

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हरियाली अमावस्या कब और क्यों मनाया जाता है यह पर्व, जानिए महत्व

हरियाली अमावस्या पर्व को हरियाली के आगमन के रूप में मनाते हैं। इस दिन किसान आने वाले वर्ष में कृषि कैसी होगी इनका अनुमान लगाते हैं, शगुन करते हैं। इस दिन वृक्षारोपण का कार्य विशेष रूप से किया जाता है।
वर्षो पुरानी परंपरा के निर्वहन के रूप में हरियाली अमावस्या के दिन एक नया पौधा लगाना शुभ माना जाता है।
हरियाली अमावस्या के दिन सभी लोग वृक्ष पूजा करने की प्रथा के अनुसार पीपल और तुलसी के पेड़ की पूजा करते हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथों में पर्वत और पेड़-पौधों में भी ईश्वर का वास बताया गया है। पीपल में त्रिदेवों का वास माना गया है।
आंवले के वृक्ष में भगवान श्री लक्ष्मीनारायण का वास माना जाता है।
अमावस्या के दिन कई शहरों में हरियाली अमावस्या के मेलों का भी आयोजन किया जाता है। इस कृषि उत्सव को सभी समुदायों के लोग आपस में मिलकर मनाते हैं। एक-दूसरे को गुड़ और धानी का प्रसाद देकर मानसून ऋतु की शुभकामना देते हैं।
इस दिन अपने हल और कृषि यंत्रों का पूजन करने का रिवाज है।
इस पर्व के ठीक 3 दिन बाद हरियाली तीज का पर्व भी आता है।
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इस तिथि को अपने पितरों की आत्मा को शांति के लिए हवन पूजा पाठ दान दक्षिणा देने का विशेष महत्व है।
हर अमावस्या में सावन महीने की हरियाली अमावस्या का अपना खास महत्व है।
सावन की फूल बहार और खुशनुमे पर्यावरण का स्वागत करने के लिए हरियाली अमावस्या को एक पर्व की भांति मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न स्थानों पर मेलों और पूजा पाठ का भी आयोजन किया जाता है। पीपल तथा आंवले के वृक्ष की इस दिन पूजा कर एक नया वृक्ष लगाने का संकल्प भी किया जाता है।
हरियाली अमावस्या के दिन उत्तर भारत में मथुरा और वृंदावन के खासकर बांके बिहारी मंदिर एंव द्वारकाधिश मंदिर विशेष पूजा और दर्शन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शिव मन्दिरों में भी लोग अमावस्या के दिन दर्शन और पवित्र स्नान करने जाते हैं।
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